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राजस्थान में कांग्रेस पर संकट हार सकते हैं अनेक बड़े कांग्रेसी नेता ??

पिछले 5 वर्षों से प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। कांग्रेस पार्टी लगातार सत्ता के स्वप्न देख रही है किंतु सत्ता प्राप्ति के लिए आवश्यक कदम उठाने से भी कांग्रेस पार्टी परहेज करती दिख रही है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की मुसीबतें कम होती नहीं दिख रही। भाजपा सरकार के खिलाफ जिस प्रकार का एंटी इनकंबेंसी का माहौल बनता दिख रहा था, उसे भुनाने में कांग्रेस पार्टी पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। नेतृत्व के संकट से जूझ रही कांग्रेस पार्टी के लिए सचिन पायलट एक ठंडी हवा का झोंका साबित हो सकते थे। लेकिन अशोक गहलोत के रणनीतिक चक्रव्यूह में फंसकर सचिन पायलट भी असहाय से दिख रहे हैं। मजे की बात यह है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी पर तो संकट मंडरा ही रहा है, साथ ही कांग्रेस के कई बड़े दिग्गज नेता भी चुनाव हारते दिख रहे हैं।

सबसे पहले बात करें राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट की… सचिन पायलट ने अजमेर से लोकसभा चुनाव लड़ा था। इसलिए विधानसभा चुनाव में भी लोगों का यह मानना था कि वह नसीराबाद अथवा अजमेर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली किसी भी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। किंतु प्रदेश में अपने लिए सुरक्षित सीट ढूंढ रहे पायलट की तलाश टोंक पर जाकर समाप्त हुई। टोंक में गुर्जर और मुस्लिम मतों के सहारे अपनी नैया पार करवाने की सोच रखने वाले सचिन पायलट को पता भी नहीं था कि भारतीय जनता पार्टी उनके सामने यूनुस खान को खड़ा करके मास्टर स्ट्रोक खेलेगी। यूनुस खान मुस्लिम वोटों का अपनी तरफ ध्रुवीकरण तो कर ही सकते हैं, साथ ही यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा का मूल वोट भी यूनुस खान की ओर गया तो सचिन पायलट का जीतना मुश्किल हो सकता है। रही सही कसर अशोक गहलोत भी पूरी कर सकते हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अशोक गहलोत टोंक विधानसभा क्षेत्र के माली समाज के मतदाताओं तक यदि अपना संदेश भेजने में कामयाब रहे और मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी राह में से सबसे प्रमुख कांटे को दूर करने का मन बना ले तो कोई बड़ी बात नहीं है कि सचिन पायलट को इस चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ जाए। केवल सचिन पायलट ही नहीं प्रदेश में अशोक गहलोत के अतिरिक्त लगभग सभी बड़े कांग्रेसी नेता अपने अपने विधानसभा क्षेत्र में बुरी तरह घिरे हुए हैं। सीपी जोशी को नाथद्वारा में महेश प्रताप सिंह कड़ी टक्कर दे रहे हैं। सीपी जोशी ने चुनाव प्रचार के दौरान जिस प्रकार से जातिवाद का सहारा लेते हुए साध्वी रितंभरा, उमा भारती और नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा था, वह बयान सीपी जोशी के लिए गले की फांस बना हुआ है। ब्राह्मण वोटों को एकजुट करने के लालच में सीपी जोशी दलित वोटों से भी हाथ धो बैठे। एक समय धुर विरोधी रहे अशोक गहलोत और सीपी जोशी की वर्तमान समय में क्या केमिस्ट्री है यह बात भी नाथद्वारा के चुनाव परिणाम पर गहरा असर डाल सकती है। कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष रहे रामेश्वर डूडी नोखा में संघर्ष करते दिख रहे हैं।

रामेश्वर डूडी की आस कन्हैया लाल झंवर के भंवर में अटकी हुई है। नोखा में झंवर का अच्छा खासा प्रभाव है, इस प्रभाव को भुनाने के लिए ही टिकट वितरण से ऐन वक्त पहले डूडी द्वारा आलाकमान को दिखाई गई नाराजगी आज फिर चर्चा का विषय बनी हुई है। वागड़ में कांग्रेस का चेहरा महेंद्रजीत सिंह मालवीय की राजनीति भी डावाडोल हो रही है। मालवीय का व्यवहार और स्वभाव उनके आड़े आता दिख रहा है। वनवासी आदिवासी समाज में जिस प्रकार से महेंद्रजीत सिंह मालवीय का प्रभाव घटा है, उससे वागड़ में कांग्रेस के लिए मुश्किलें पैदा होने वाली हैं। नागौर जिले में हनुमान बेनीवाल कांग्रेस के लिए चिंता का कारण बने हुए हैं। वहीं दूसरी ओर सीकर जिले में कुछ स्थानों पर मुस्लिम प्रत्याशी तो कुछ स्थानों पर कांग्रेस के बागियों ने भाजपा उम्मीदवारों की राह आसान कर दी है। राजधानी जयपुर की बात करें तो कांग्रेस के लिहाज से सबसे मजबूत कही जाने वाली सिविल लाइन सीट में भी प्रताप सिंह खाचरियावास के पसीने छूट रहे हैं। चुनाव से ऐन वक्त पहले प्रताप सिंह खाचरियावास का जो वीडियो वायरल हुआ है उसमें वे अपनी हार देख चुके हैं। जनता के सामने रोते गिड़गिड़ाते खाचरियावास की बॉडी लैंग्वेज से स्पष्ट समझ में आता है कि उनके लिए सिविल लाइंस का चुनाव जीत पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन नजर आ रहा है। हवामहल सीट से महेश जोशी को ब्रजकिशोर शर्मा की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। इसी प्रकार अनेक कांग्रेसी नेता अपने अपने मैदान में उलझे हुए नजर आ रहे हैं। कुछ स्थानों पर वरिष्ठ नेताओं की गुटबाजी तो कुछ स्थानों पर कार्यकर्ताओं से दूरी के चलते कांग्रेस के उम्मीदवारों की हालत खस्ता है। पूरे राजस्थान का विश्लेषण करें तो स्पष्ट होता है कि इन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के कई बड़े चेहरे धराशाई होने वाले हैं और कांग्रेस पर संकट लगातार बढ़ता ही दिख रहा है।

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