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राजस्थान के रण में क्या जीत रही है भाजपा ??

राजस्थान में 7 दिसंबर को मतदान है। मतदान से पहले प्रदेश में माहौल बदल गया है। कुछ महीने पहले तक रक्षात्मक रणनीति अपना रही भारतीय जनता पार्टी जिस प्रकार से पिछले 15 दिन में आक्रामक हुई है उससे स्थितियां बदल गई है। अमित शाह की रणनीति, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कर्मठ कार्यकर्ताओं का परिश्रम और कैडर बेस पार्टी होने के कारण भारतीय जनता पार्टी ने मतदान से ठीक पहले कांग्रेस पर बढ़त बना ली है। प्रदेश के राजनीतिक माहौल की चर्चा करें तो स्पष्ट रूप से समझ में आता है कि भाजपा जहां एक होकर इस चुनाव में जुटी हुई है वहीं दूसरी ओर कांग्रेस अनेक गुटों में बंटी हुई है। प्रदेश भाजपा वसुंधरा राजे के नेतृत्व में सारे गिले-शिकवे मिटाकर एकमुखी होकर कांग्रेस से मुकाबला करने के लिए तैयार है। वहीं दूसरी ओर आखिरी समय तक कांग्रेस पार्टी अशोक गहलोत, सचिन पायलट और रामेश्वर डूडी के गुटों में बंटी नजर आ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का तो यहां तक कहना है कि कांग्रेस के कई नेता स्वयं इस प्रयास में लगे हैं कि वे दूसरे गुट के कांग्रेसी नेताओं को चुनाव हरवा दें।

पिछले 2 महीने में इन दोनों पार्टियों की गतिविधियों पर नजर डालें तो स्पष्ट रूप से समझ आता है कि भाजपा ने पार्टी कार्यकर्ताओं को लगातार कार्यक्रम देकर व्यस्त रखा। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी गुटबाजी के भंवर से नहीं निकल पाई। भारतीय जनता पार्टी ने बूथ संपर्क महाअभियान, मेरा घर भाजपा घर, दीपावली मंगल मिलन, कमल दीया अभियान जैसे अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से प्रदेश के घर घर तक दस्तक दी है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी भाजपा की राह पर चलते हुए मेरा बूथ मेरा गौरव जैसे कार्यक्रम आयोजित करने के प्रयास करती रही। किंतु कार्यकर्ताओं की आपसी गुटबाजी के कारण वे कार्यक्रम शक्ति प्रदर्शन में बदलकर अनेक स्थानों पर मारपीट हाथापाई का कारण बने। भाजपा ने कांग्रेस के मेरा बूथ मेरा गौरव को मेरा बूथ मेरा जूत कह कर खूब लाभ उठाया। प्रदेश में यदि तीसरी शक्ति या तीसरे मोर्चे के राजनीतिक प्रभाव का आकलन करें तो स्पष्ट होता है कि हनुमान बेनीवाल और घनश्याम तिवाड़ी की जुगलबंदी भी अनेक स्थानों पर भारतीय जनता पार्टी को लाभ पहुंचा सकती है। यह स्पष्ट ही है कि हनुमान बेनीवाल के समर्थक नागौर जिले और आसपास के क्षेत्र में अच्छा खासा प्रभाव रखते हैं। इस क्षेत्र में या पूरे प्रदेश में कहा जाए तो जाट मतदाताओं का रुझान कांग्रेस की तरफ अधिक रहा है। ऐसे में यदि हनुमान बेनीवाल अलग से शक्ति केंद्र के रूप में उभर कर वोट लेते हैं तो कांग्रेस के वोटों में ही सेंध लगती हुई दिख रही है। इसी प्रकार यदि वोटों का कुछ प्रतिशत एंटी इनकंबेंसी के कारण कांग्रेस की तरफ जाता, उस वोट को कांग्रेस की तरफ जाने से रोकने का काम घनश्याम तिवाड़ी की भारत वाहिनी पार्टी भी कर सकती है। कहा जा सकता है कि बेनीवाल और घनश्याम तिवाड़ी मिलकर कांग्रेस की बैंड बजा सकते हैं .. बांसुरी बजा सकते हैं। भाजपा कार्यकर्ताओं की संगठन निष्ठा, उनकी सक्रियता और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा दी गई रणनीति कांग्रेस के अति आत्मविश्वास पर भारी पड़ती दिख रही है। कांग्रेस और भाजपा में एक बड़ा अंतर यह भी दिखता है कि भाजपा के पास स्टार प्रचारकों की एक लंबी फौज है। नरेंद्र मोदी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी जैसे अनेक नेताओं ने राजस्थान में खूब समय दिया और भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया। दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी ने के पास राहुल गांधी के अलावा कोई बड़ा चेहरा नजर नहीं आया। अभिषेक मनु सिंघवी और राज बब्बर के कुछ कार्यक्रम राजस्थान में हुए हैं, उनसे भी कांग्रेस को नुकसान ही उठाना पड़ा। अभिषेक मनु सिंघवी का पुराना मामला फिर से मीडिया में उछला और राज बब्बर द्वारा नक्सलवादियों को क्रांतिकारी बताने वाले मामले ने भी भाजपा को लाभ पहुंचाया है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पिछले 2 महीने में भारतीय जनता पार्टी ने जिस प्रकार से बूथ तक और घर-घर तक पहुंच कर संपर्क अभियान चलाया है, जिस प्रकार से पार्टी एकजुट और एकमुखी होकर चुनाव लड़ने को तैयार हुई है.. इससे भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर अच्छी खासी बढ़त बना ली है।

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